शेड्यूल K के सीरियल 23 जितना ही घातक है सीरियल 5

शेड्यूल K के सीरियल 23 जितना ही घातक है सीरियल 5- फार्मेसी स्टूडेंट्स में आजकल शेड्यूल K की बहुत चर्चा हो रही है. जिसे देखो वो इस बात से चिंतित नजर आ रहा है कि शेड्यूल K में होने वाले बदलाव फार्मेसी प्रोफेशन को और अधिक बर्बादी का रास्ता दिखाएँगे.


विद्यार्थी पहले से ही फार्मेसी फील्ड में रोजगार की अल्प संभावनाओं को लेकर परेशान हो रहे हैं ऊपर से इस शेड्यूल K का अतिरिक्त दबाव भी इनके माथे पर चिंता की रेखाओं को बढ़ा रहा है. सभी को लग रहा है कि फार्मासिस्ट का अस्तित्व संकट में है.

स्वास्थ्य के क्षेत्र में फार्मासिस्ट की पहचान तो पहले से ही संकट में है. अगर कहीं थोड़ी बहुत पहचान है तो वह या तो मेडिकल स्टोर पर दवा वितरित करने वालों के रूप में या फिर मेडिकल स्टोर मालिकों से अपनी डिग्री या डिप्लोमा के बदले किराया वसूलने वालों के रूप में है.

अपनी शिक्षा को लाइसेंस के रूप में भाड़े पर देकर ये स्वयं अपनी पहचान मिटाने पर तुले हुए हैं. कहीं ऐसा तो नहीं है कि इन्हें शायद यह डर सता रहा है कि शेड्यूल K में होने वाले इस अमेंडमेंट से शायद भविष्य में यह भाड़ा भी नहीं मिल पाएगा.

फार्मेसी की शिक्षा का वास्तविक और कड़वा सच

दरअसल सभी फार्मासिस्ट अपनी शिक्षा को किराये पर नहीं लगाते परन्तु आंकड़े बताते हैं कि अधिकतर दवा की दुकानों पर फार्मासिस्ट नहीं स्वयं दवा विक्रेता ही दवा का वितरण करते हैं.

सरकार को भी शायद यह बात पता है इसलिए ही वह इस शेड्यूल K के सीरियल 23 में बदलाव कर सरकारी दवा वितरण के क्षेत्र में फार्मासिस्टों की जगह नर्स, हेल्थ वर्कर आदि से दवा वितरित करवाना चाहती है.

जब कोई अयोग्य दुकानदार दवा बाँट सकता है तो फिर वह नर्सिंग कर्मी दवा क्यों नहीं बाँट सकता जो स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपनी एक विशेष पहचान रखता है? शायद यहाँ, यह लॉजिक ही कार्य कर रहा है.

आखिर यह शेड्यूल K है क्या, जिसके लिए विद्यार्थी इतना अधिक चिंतित हो रहे हैं? क्या वास्तव में इससे फार्मेसी प्रोफेशन का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा?

शेड्यूल K मुख्यतया चर्चा में तब आया जब इसी महीने की 6 तारीख को केंद्र सरकार ने शेड्यूल K के सीरियल नंबर 23 में अमेंडमेंट करने के लिए आपत्तियाँ मांगी. अधिकांश फार्मासिस्टों को इसके बारे में तब ही पता चला.

दरअसल केंद्र सरकार नेशनल हेल्थ पालिसी 2017 के माध्यम से स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना चाहती है. इस पालिसी के माध्यम से सरकार शेड्यूल K के सीरियल 23 में एक्जेम्प्शन को बढ़ाना चाहती है.

फार्मेसी के गिद्ध

सरकार शेड्यूल K के सीरियल नंबर 23 में अमेंडमेंट कर इसका दायरा रूरल से अर्बन क्षेत्रों तक बढाने, नर्सिंग कर्मियों, एएनएम, आंगनबाड़ी वर्कर्स के साथ आशा वर्कर्स आदि को जोड़ने तथा वेलनेस सेंटर्स को भी इस एक्जेम्प्शन के दायरे में लाना चाहती है.

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह अमेंडमेंट सिर्फ सीरियल 23 में बदलाव लाएगा पूरे शेड्यूल K में नहीं. अब समस्या यह है कि एक तो पहले ही शेड्यूल K समझ में नहीं आ रहा है ऊपर से अब सीरियल नंबर 23 भी एक नई मुसीबत बन गया है.

हमें शेड्यूल K के साथ-साथ सीरियल नंबर 23 को भी समझना होगा.

ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट 1940 एंड रूल्स 1945 का पार्ट X1, जो कि एक्जेम्प्शन के बारे में है, और बताता है कि शेड्यूल K के अंतर्गत आने वाली सभी ड्रग्स चैप्टर IV से एक्जेम्पटेड रहेगी यानि शेड्यूल K के अंतर्गत आने वाली सभी दवाइयों पर चैप्टर IV के नियम कायदे लागू नहीं होंगे.

अब हमें चैप्टर IV को देखना होगा. ड्रग्स तथा कॉस्मेटिक्स प्रोडक्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग, सेल तथा डिस्ट्रीब्यूशन इसके अनुसार गोवेर्न होते हैं यानि चैप्टर IV में वो नियम कायदे लिखे हुए हैं जिनके अनुसार दवाइयों का निर्माण, बिक्री तथा वितरण होता है.

इन सभी नियमों  में एक बात साफ है कि दवाइयों की सेल तथा डिस्ट्रीब्यूशन केवल रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट ही कर सकता है. परन्तु शेड्यूल K के माध्यम से ऐसे प्रावधान कर दिए गए हैं कि फार्मासिस्ट के बिना भी ड्रग्स का बिक्री तथा वितरण किया जा सकता है.

फार्मासिस्ट की जरूरत कहाँ है?

सबसे पहले बात उस प्रावधान की करते हैं जो अभी चर्चा में हैं. यह प्रावधान शेड्यूल K के सीरियल नंबर 23 के रूप में है. यह सीरियल 23, भारत सरकार ने 22 सितम्बर 1980 (Ins. by G.O.I. Notification No. GSR 540(E) dt 22.9.1980) को जोड़ा था जिसके अनुसार रूरल हेल्थ स्कीम के अंतर्गत सब सेण्टर तथा प्राइमरी हेल्थ सेण्टर पर मल्टीपर्पज वर्कर्स तथा रूरल हेल्थ वोलंटियर ड्रग्स की सप्लाई करेंगे.

बाद में 28 अगस्त 1989 (Amended by G.O.I. Notification No. GSR 784 (E) dt 28.8.1989) को एक अमेंडमेंट के द्वारा नर्स, एएनएम, लेडी हेल्थ विजिटर, आंगनबाड़ी वर्कर्स आदि को अर्बन फॅमिली वेलफेयर सेण्टर, सब सेण्टर तथा प्राइमरी हेल्थ सेण्टर पर दवा वितरित करने के लिए जोड़ा गया.

अब आज शेड्यूल K के इस सीरियल नंबर 23 को लेकर सभी चिंतित हो रहे हैं, जबकि यह तो वर्ष 1980 से ही लागू है. जब पिछले लगभग 40 वर्षों से ये लोग दवा वितरित कर रहे हैं और हमें कोई ऑब्जेक्शन भी नहीं रहा तो अब इनके दवा वितरित करने से ऐसा क्या हो जाएगा? जब हम पिछले चालीस वर्षों से सो रहे हैं तो आज ऐसा क्या हो गया कि हमें जागना पड़ा?

ऐसा लगता है कि जैसे केंद्र सरकार ने स्वयं फार्मेसी वालों को कुम्भकर्णी नींद से जगा कर कहा है कि भाई थोडा विरोध तो कर लो.

शायद केंद्र सरकार की यह बात फार्मेसी के विद्यार्थियों को समझ में आ गई और वो विरोध करने लग गए. विद्यार्थियों के अतिरिक्त फार्मेसी फील्ड से अन्य प्रोफेशनल्स की प्रतिक्रियाएँ देखने को नहीं मिली हैं.

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यह आज की पीढ़ी है जो देर से ही सही पर जागी तो है. पुरानी पीढ़ी तो आज भी उसी कुम्भकर्णी नींद में सोई हुई है. मैंने स्वयं फार्मेसी फील्ड के बहुत से लोगों को शेड्यूल K के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करने को कहा परन्तु लगभग सभी ने कोई ना कोई बहाना बना दिया.

ऐसा लगता है कि फार्मेसी प्रोफेशन में खासकर एजुकेशन से सम्बंधित लोग किसी अनजाने खौफ से ग्रस्त है. शायद सबके व्यक्तिगत स्वार्थ सर्वोपरि हैं.

नहीं तो शिक्षा से जुड़े लोगों को इसके विरोध में सर्वप्रथम आगे आना चाहिए था क्योंकि जब दवा वितरण में फार्मासिस्ट की जरूरत ही नहीं रहेगी तो फिर पढने कौन आएगा?

यह  विद्यार्थियों का दोष नहीं है कि वे इस शेड्यूल K को ढंग से नहीं जानते हैं. विद्यार्थी तो तब जानेंगे जब उन्हें इस सम्बन्ध में कभी बताया जाएगा. फार्मेसी शिक्षा में हालात यह है कि अधिकतर टीचर्स को भी ढंग से शेड्यूल K के सम्बन्ध में शायद ही पता हो.

टीचर्स भी आखिर क्या करे जब देश में फार्मेसी की शिक्षा तथा प्रोफेशन को रेगुलेट करने वाली फार्मेसी कौंसिल ऑफ इंडिया खुद चालीस वर्षों बाद आधी अधूरी सी जागी है. जब नियामक संस्था ही सुषुप्तावस्था में है तो सभी अपने आप मौन हो जाते हैं.

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पीसीआई ने अभी 27 नवम्बर को मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फॅमिली वेलफेयर को पत्र एवं ईमेल लिखकर प्रार्थना की है कि शेड्यूल K के सीरियल नंबर 23 में अमेंडमेंट कर इसका दायरा अर्बन क्षेत्रों तक ना बढाया जाए, आशा वर्कर्स को ना जोड़ा जाए तथा वेलनेस सेंटर्स को इस एक्जेम्प्शन के दायरे में ना लाया जाए.

पीसीआई के पत्र की भाषा में इतनी प्रार्थना रुपी चाटुकारिता झलक रही है कि कही लगता ही नहीं है कि इसने विरोध किया है. ऐसा लगता है कि इसने प्रार्थना करके अपना फर्ज पूरा कर लिया है.

आखिर इस शेड्यूल K के सीरियल नंबर 23 का पिछले 40 वर्षों में फार्मेसी प्रोफेशन पर क्या असर पड़ा है? इस सीरियल 23 की वजह से प्राइमरी हेल्थ सेण्टर तथा सब सेण्टर पर तो पहले से ही फार्मासिस्ट की जरूरत नहीं रही, अब अगर यह अमेंडमेंट हो जाएगा तो फिर शहरी क्षेत्रों में भी फार्मासिस्ट की अधिक जरूरत नहीं पड़ेगी.

पिछले कुछ वर्षों में फार्मासिस्ट की नियुक्ति सरकारी हॉस्पिटलों में दवा वितरण के लिए होना शुरू हुई है. एक तरफ तो फार्मासिस्ट "जहाँ दवा, वहाँ फार्मासिस्ट" के नारे के साथ सरकारी हॉस्पिटल में पद बढाने की मांग कर रहा है, दूसरी तरफ इस व्यवस्था से फार्मासिस्ट की जरूरत ही समाप्त हो जाने का अंदेशा है.

सरकारी हॉस्पिटल में वैसे ही डॉक्टर्स तथा नर्सों का बोलबाला है, सरकार की अधिकतर पॉलिसीज में इनका दखल रहता है.

जब हॉस्पिटल तथा सरकार की अन्य योजनाओं में फार्मासिस्ट की जगह अन्य लोग दवा वितरित करेंगे तब भविष्य में निजी क्षेत्र के दवा विक्रेता भी सरकार से यही मांग करेंगे. देश में पहले भी निजी क्षेत्र के दवा विक्रेताओं की तरफ से यह मांग कई बार उठ चुकी है.

फार्मेसी में डिप्लोमा तथा डिग्री के नए कॉलेज कुकुरमुत्तों की तरफ फैल गए हैं. इसी वर्ष 2019 में 970 नए कॉलेजों को मान्यता दी गई है.

फार्मेसी कौंसिल ऑफ इंडिया के अनुसार वर्तमान में डी फार्म, बी फार्म तथा फार्म डी के कुल इंस्टिट्यूटों की संख्या 5250 है जिनमे प्रतिवर्ष 314304 विद्यार्थी प्रवेश लेते हैं. देश में रजिस्टर्ड फार्मासिस्टों की कुल संख्या लगभग बारह लाख से ऊपर है.

हर वर्ष तीन लाख से अधिक फार्मासिस्ट शिक्षा ग्रहण करके निकलते हैं. फार्मासिस्ट के पास सरकारी क्षेत्र में ले देकर एक ही तो रोजगार का अवसर है, दवा बाँटना.

अब अगर यह अवसर भी छीन कर दूसरों को दे दिया जाएगा तो फिर इस कोर्स की क्या प्रासंगिकता रह जाएगी. डी फार्म कोर्स की तो बुनियाद ही दवा की बिक्री तथा वितरण पर टिकी हुई है.

AIOCD के डाटा के अनुसार वर्तमान में सम्पूर्ण भारत में रिटेल फार्मेसी की संख्या आठ लाख को पार कर गई है.

यह भी एक कडवी सच्चाई है कि वर्तमान में डी फार्म से लेकर बहुत से पीएचडी डिग्री होल्डर भी सरकारी क्षेत्र में दवा वितरण के कार्य में लगे हुए हैं.

पीएचडी डिग्री होल्डर का सरकारी दवा वितरण में कार्य करना अपने आप में रोजगार के अन्य अवसरों में कमी का एक संकेत है . एक तो पहले से ही रोजगार के अवसर सीमित है, और अब उसे भी छीना जा रहा है.

अधिकतर फार्मासिस्टों को अपने अधिकारों के सम्बन्ध में पता ही नहीं है. इतना हो हल्ला मचने के बाद में भी सिर्फ शेड्यूल K के सीरियल नंबर 23 पर ही बात हो रही है. हमें यह मालूम होना चाहिए कि शेड्यूल K में सीरियल नंबर 23 के अलावा एक और प्रावधान है जो फार्मासिस्टों के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप कर रहा है.

यह प्रावधान है शेड्यूल K का सीरियल नंबर 5. इसे भारत सरकार ने 9 अप्रैल 1960 को एक अमेंडमेंट (Amended under G.O.I. Notification No.F.I-22/59-D dated 9-4-1960) के द्वारा एक्ट में जोड़ा था. यह प्रावधान किसी भी रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर को अपने मरीजों के लिए दवा देने का अधिकार देता है.

वर्ष 1960 में फार्मासिस्ट नगण्य थे तब यह बात चल गई परन्तु आज देश में लाखों फार्मासिस्ट प्रति वर्ष फार्मेसी की पढाई कर रहे हैं, लाखों रिटेल फार्मेसी मौजूद है जहाँ मरीज को चौबीसों घंटे दवाइयाँ मिल जाती है.

आज के परिपेक्ष्य में यह बात कतई जायज नहीं है कि रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट के होते रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर दवा का वितरण करें.

अधिकतर रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर इस सीरियल 5 का बहुत नाजायज फायदा उठा रहे हैं विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र में.

थोक दवा विक्रेताओं से बात करने पर पता चलता है कि रिटेल ड्रग स्टोर की तरह डॉक्टर्स के नाम पर भी लाखों रुपयों के बिल बनते हैं. अगर वास्तव में यह बात सही है तो फिर ऐसे डॉक्टर्स को रिटेल स्टोर की कहाँ जरूरत पड़ती होगी.

क्या डॉक्टर्स वास्तव में सिर्फ अपने पेशेंट्स को ही दवा का वितरण करते हैं? अगर करते हैं तो क्या डॉक्टर्स द्वारा पेशेंट को दी गई दवा का कोई बिल दिया जाता है?

अगर बिल नहीं दिया जाता तो क्या यह फ्री सेवा है? बहुत से पीडियाट्रिशियन अपने क्लिनिक पर बिना रिटेल फार्मेसी के वैक्सीनेशन करते हैं. क्या इस वैक्सीन का बिल मरीजों को दिया जाता है?

जिस प्रकार अधिकतर डॉक्टर्स द्वारा मरीज को परामर्श शुल्क की कोई रसीद नहीं दी जाती है ठीक उसी प्रकार इनके द्वारा मरीजों को दी जाने वाली दवा का कोई बिल भी नहीं दिया जाता है.

आखिर यह कैसे तय होगा कि दवा दी गई है या बेचीं गई है? पेशेंट के नाम पर बिना बिल के दवाओं का वितरण अवैध होना चाहिए.

फार्मासिस्ट तो इस तथ्य से अनभिग्य है ही, परन्तु ऐसा लगता है कि हमारी फार्मेसी कौंसिल भी इस तथ्य से अनभिग्य है. शायद ही फार्मेसी कौंसिल ने इस सीरियल 5 के खिलाफ कभी अपना विरोध भारत सरकार के पास दर्ज करवाया हो.

फार्मेसी कौंसिल की हालिया चिट्ठी में भी सीरियल 23 का जिक्र है परन्तु सीरियल 5 का कहीं पर भी जिक्र नहीं है. आखिर ऐसा क्यों? क्या फार्मेसी कौंसिल में यह मान लिया है कि डॉक्टर्स अपने पेशेंट के लिए दवा का वितरण कर सकते हैं?

फार्मासिस्टों के साथ-साथ फार्मेसी कौंसिल जैसी नियामक संस्था को भी फार्मेसी प्रोफेशन के हित के लिए, बेरोजगार फार्मासिस्टों के लिए, शेड्यूल K के सीरियल नंबर 23 के साथ-साथ सीरियल 5 का भी पुरजोर तरीके से विरोध करना होगा.

साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि दवा सिर्फ फार्मासिस्ट के हाथों ही वितरित होनी चाहिए. जिस प्रकार सरकारी क्षेत्र में नर्स, हेल्थ वर्कर, आशा सहयोगी, आंगनबाड़ी वर्कर्स आदि का विरोध किया जा रहा है ठीक उसी प्रकार निजी क्षेत्र में किरायेबाज फार्मासिस्टों का भी विरोध होना चाहिए.

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Written by:
Ramesh Sharma

ramesh sharma pharmacy tree

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