सफलता के लिए आत्म विश्लेषण अत्यावश्यक

सफलता के लिए आत्म विश्लेषण अत्यावश्यक - जाने अनजाने में ही सही परन्तु हम सभी को जीवन में कभी न कभी आत्म विश्लेषण की जरूरत पड़ती रहती है।


आत्म विश्लेषण करना बहुत आवश्यक होता है क्योंकि यह हमें हमारी कमियों के बारे में बताता है। जब हमें हमारी कमियों के बारे में पता चल जाता है तब इन कमियों को दुरस्त करके इनको सुधारना बहुत आसान बन जाता है।


इस दुनिया में कोई भी इंसान परिपूर्ण नहीं होता है तथा हर इंसान में कोई न कोई कमी अवश्य होती है। परिपूर्ण तो सिर्फ ईश्वर को ही कहा जा सकता है।


कहते हैं कि अपनी कमियों को जाननें के लिए निंदक का पास होना जरूरी होता है परन्तु आधुनिक युग में सफल आदमी के लिए निंदक मिल पाना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि ये दुनिया सिर्फ और सिर्फ चाटुकारों से ही भरी पड़ी है। सभी मनुष्य अपना काम निकालने के लिए जी हुजूरी तथा हाँ में हाँ मिलाते नजर आते हैं।


इन सभी पारिस्थितियों में इंसान को अपने आप को ही निंदक बनाकर अपनी कमियों का अवलोकन करना चाहिए। हम कैसे अपनी इन कमियों को पहचाने तथा कैसे उनका निवारण कर अपना आत्म विश्वास बढ़ाएं, इन्ही सब बातों पर आगे प्रकाश डाला गया है।


सबसे पहले हमें यह पता करना होगा कि जब हम किसी से बात करते है तो क्या हम नजरे मिलाकर बात करते हैं या फिर नजरे नीची करके बात करते हैं? नजरे मिलाकर बात करने वाले लोग आत्मविश्वासी होते हैं जबकि नजरे न मिलाकर बात करने वाले लोगों में आत्मविश्वास की कमी पाई जाती है।


हमें अपने आप पर गौर करना चाहिए तथा अगर हममे यह कमी है तो इसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए। इस कमी को दूर करने के लिए हम आईने के सामने या फिर किसी मित्र के साथ आँख से आँख मिलाकर बात करने का अभ्यास कर सकते हैं।


क्या हम किसी से बात करते समय जरूरत से ज्यादा सिर हिलाते हैं? दरअसल जरूरत से ज्यादा सिर हिलाने पर यह समझा जाता है कि या तो हमें बात समझ में नहीं आ रही है या फिर हम बात को पूरी तरह से ध्यानपूर्वक सुन नहीं रहे हैं अर्थात हम बातों पर पर्याप्त रूप से अपने आप को केन्द्रित नहीं कर रहे हैं।


हमें जरूरत से ज्यादा सिर हिलाने के बजाय केवल एक बार हामी में सिर हिलाना चाहिए और अगर बात समझ में ही नहीं आई है तो बजाय हामी भरने के शालीनतापूर्वक उसके बारे में दुबारा पूछ लेना चाहिए।


बातचीत करते समय हाथ बांधकर बैठना या फिर खड़े रहना इस बात को इंगित करता है कि हम बातचीत में पूरी तरह से भाग नहीं ले रहे हैं तथा सिर्फ औपचारिकता वश ही बातचीत में शामिल हो रहे हैं। वैसे भी हाथ बांधकर बात करना रक्षात्मक मुद्रा होती है जो सिर्फ अपने बचाव के लिए अपनाई जाती है।


बात करते वक्त हाथ और हथेलियाँ खुली होनी चाहिए तथा बजाय बनावटी व्यवहार करने के सहज व्यवहार ही करना चाहिए।


बहुत कम मुस्कुराना तथा हमेशा गंभीर मुद्रा में रहना हमारी संकोची प्रवृति को दर्शाता है। हमें हर बात का जवाब मुस्कुराते हुए देना चाहिए परन्तु यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बिना वजह मुस्कुराना भी हमारी छवि को बिगाड़ देता है। मुस्कुराने से माहौल तनाव रहित तथा हल्का फुल्का बना रहता है तथा हमारे आत्मविश्वास की वृद्धि में भी सहायक होता है।


बार बार बालों को सहलाने, पसीना पोंछने, इधर उधर ध्यान देने से हमारे आत्मविश्वास में कमी उजागर होती है। हमें सामान्य रहकर अपनी बारी का शालीनता से इन्तजार करना चाहिए तथा अपने हाथों को सामने की तरफ रखना चाहिए जिससे हमारा आत्मविश्वास झलकता है।


उपरोक्त बिन्दुओं पर ध्यान देकर अगर उन्हें सुधारा जाए तो हमारे व्यक्तित्व में निखार तो आएगा ही, साथ ही साथ हमें किसी भी तरह के साक्षात्कार में भी सफलता दिलाने में सहायक होगा।


सफलता के लिए आत्म विश्लेषण अत्यावश्यक Self-analysis is essential for success

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