मानव देह भगवान की अद्भुत सौगात

मानव देह भगवान की अद्भुत सौगात - भगवान द्वारा रचित सभी रचनाओं में अगर कोई सबसे सुन्दर रचना है तो वह है मानव का शरीर।

अभी तक मानव देह के बारे में जितना अध्ययन किया गया है अगर उसके बारे में ध्यान से सोचा जाए तो हम पाएँगे कि अभी तक भी इंसान मानव देह के रहस्यों को पूरी तरह से नहीं समझ पाया है।

विज्ञान की इतनी प्रगति के पश्चात भी हम मानव शरीर की क्षमताओं के बारे में समझ ही नहीं पाए हैं।

पुराने जमानें से ही इंसान की उम्र के बारे में यह प्रचलित है कि इंसान की आयु सौ वर्ष की होती है मतलब कि इंसानी जीवन शतायु होता है। पुराने जमानें में यह एक औसत आयु मानी जाती थी।

इस आयु के आखिरी पड़ाव पर भी मनुष्य अपने सभी तरह के कार्यों को करने में काफी हद तक सक्षम रहता था। पुराने जमानें में पचास साठ वर्ष की आयु को अधिक आयु नहीं माना जाता था क्योंकि अधिकतर (लगभग सभी) मनुष्य शतायु होते थे।

आधुनिक युग में शतायु होना एक सपने का सच होने जैसा है। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो सौ वर्ष का जीवन पूर्ण कर पाते हैं।

आधुनिक मनुष्य अमूमन सौ वर्ष तक तो जी ही नहीं पाता है और अगर कोई सौ वर्ष तक पहुँच भी जाता है तो वह अपना जीवन बिस्तर पर दूसरों के सहारे गुजार रहा होता है। विरले लोग ही होते हैं जो सौ वर्ष की उम्र तक स्वस्थ जीवन जी पाते हैं।

आधुनिक जीवन सत्तर वर्ष तक की आयु के आस-पास ही सिमट कर रह गया है। पुराने जमानें में जितनी सहनशक्ति और ताकत एक अस्सी वर्ष के मनुष्य में होती थी आधुनिक युग में उतनी ताकत पचास वर्ष के मनुष्य में भी नहीं होती है।

छोटे-छोटे बच्चों का पेट बढ़ने लग गया है तथा युवा वर्ग युवावस्था में ही अधेड़ सा नजर आने लग गया है। शारीरिक क्षमताएँ घटते-घटते समाप्ति की तरफ बढ़ने लग गई हैं। शरीर पर जगह-जगह चर्बी की परत चढ़ जाने से इंसान वसा का गुब्बारा सा बनता जा रहा है। इंसान दिन-प्रतिदिन बेडौल होता जा रहा है।

मानव देह भगवान की अद्भुत सौगात

आखिर क्या कारण है कि जो मनुष्य सौ वर्ष बड़ी आसानी से जीता था वह मनुष्य सत्तर वर्ष भी बहुत मुश्किल से जी पाता है? क्या कारण है कि इंसान के अलावा अन्य सभी प्राणियों की आयु आज भी उतनी ही है जितनी हजारों वर्ष पहले थी?

उपरोक्त प्रश्नों का प्रमुख कारण मनुष्य की दिनचर्या और उसके जीवनचक्र में आमूलचूल परिवर्तन होना है।

मनुष्य के अलावा अन्य सभी प्राणी अभी तक प्राकृतिक जीवन ही जी रहे हैं जबकि इंसान ने अपना जीवन पूर्णतया कृत्रिम बना लिया है। आज का इंसान न तो प्राकृतिक तरीके से खा पा रहा है तथा न ही प्राकृतिक तरीके से सो पा रहा है।

खाना तथा सोना हर प्राणी के जीवन की आधारभूत आवश्यकता है जिसका प्रकृति के साथ एक समन्वय होता है। इस समन्वय को इंसान ने पूरी तरह से समाप्त कर दिया है जिसके परिणामस्वरूप इंसान का शरीर तथा सेहत बिगड़ती जा रही है। हम जितना प्रकृति से दूर हो रहे हैं उतना ही हम अपनी आयु को कम कर रहे हैं।

हम खुले मैदानों की ठंडी हवा को छोड़कर वातानुकूलित कमरे में ठंडी हवा में रहना पसंद कर रहे हैं। धूप में न बैठकर वातानुकूलित कमरे के तापमान को समायोजित करके गर्मी का अहसास कर लेते हैं। चाँदनी रातों को टेलीविजन के परदे पर देखकर उसका सुख अनुभव कर लेते हैं।

दरअसल हम इस जीवन में सच्चाई से बहुत दूर रहकर हर चीज का सिर्फ और सिर्फ अनुभव ही कर रहे हैं क्योंकि हमारे पास किसी भी कार्य को करने के लिए समय नहीं है।

इंसान मशीन बनता जा रहा है जिसकी कल्पना स्वयं इंसान ने भी नहीं की होगी। हम सभी भली भाँति जानते हैं कि मशीन का कोई जीवन नहीं होता है तथा मशीन दूसरे के हाथों का खिलौना भर होती है जिसे काम में लेने के पश्चात एक तरफ रख दिया जाता है।

सृष्टि के रचयिता ने इंसान को इंसान बने रहने के लिए पैदा किया है न कि मशीन बनने के लिए।

जैसे-जैसे इंसान परिश्रम से दूर होकर नित नए आराम पाने के जरिये ढूँढ रहा है वैसे-वैसे उसका शरीर उसका साथ छोड़ता जा रहा है। जिस प्रकार मशीन बिना ईंधन के नहीं काम करती है ठीक उसी प्रकार शरीर भी बिना प्रकृति के नियमों का पालन किये नहीं चल सकता है।

जो मनुष्य जितना अधिक प्रकृति के निकट रहकर उसके नियमों का पालन करते हुए जीवन निर्वाह करेगा वही मनुष्य स्वस्थ एवं सुखमय जीवन व्यतीत कर पाएगा।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि किसी भी इंसान के पास अपने शरीर के लिए भी समय नहीं है तथा शरीर उसकी प्राथमिकताओं में अंतिम स्थान पर है। शरीर पर ध्यान सिर्फ और सिर्फ मजबूरी में और चिकित्सक की सलाह पर कुछ दिनों के लिए ही दिया जाता है।

मानव देह भगवान की अद्भुत सौगात Human body amazing gift of God

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