किशोरावस्था जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव

किशोरावस्था जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव - मनुष्य जीवन ईश्वर की अनमोल देन है जो कई अवस्थाओं में विभक्त है जैसे बाल्यावस्था, किशोरावस्था, यौवनावस्था, प्रोढ़ावस्था और वृद्धावस्था।

हर अवस्था शरीर में कुछ विशेष प्रकार के परिवर्तन लाती है जिसके पश्चात शरीर में कुछ बदलाव शुरू होने लगते हैं।

मनुष्य जीवन में हर अवस्था का अपना अलग महत्त्व होता है और क्रम से सभी अवस्थाओं को जीते हुए मृत्यु की प्राप्ति होती है।

मुख्य रूप से हम जीवन को बचपन, जवानी और बुढ़ापा नामक तीन अवस्थाओं से जोड़ते हैं परन्तु गहनता से विश्लेषण करने पर यह उपरोक्त वर्णित पाँच अवस्थाओं में विभक्त होती प्रतीत होती है।

जीवन में हर अवस्था का अपना एक अलग जीने का तरीका होता है जैसे जो कार्य बचपन में अच्छे लगते हैं वो कार्य जवानी में अच्छे नहीं लगते हैं और जो कार्य जवानी में अच्छे लगते हैं वही कार्य बुढ़ापे में अच्छे नहीं लगते हैं।

परमात्मा ने हर उम्र और हर अवस्था को वैज्ञानिक तरीके से परिभाषित किया है अन्यथा इंसान के जीवन में एकरूपताओं का आधिक्य हो जाता और जीवन बड़ा नीरस हो जाता।

सभी अवस्थाओं में से सबसे महत्वपूर्ण अवस्था किशोरावस्था होती है क्योकि ये अवस्था सभी अवस्थाओं का बसंत कहलाती है। जैसे बसंत ऋतु पेड़ पौधों में विकास और हरियाली लेकर आती है ठीक उसी प्रकार किशोरावस्था भी इंसान के जीवन में शारीरिक विकास और उमंगें लेकर आती है।

किशोरावस्था मुख्य रूप से दस वर्ष से लेकर अठारह वर्ष होने तक की उम्र को माना जाता है। यह उम्र काफी नाजुक उम्र होती है जिसमे व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से विकसित होना शुरू होता है जिसमें बचपन पीछे छूटकर जवानी को गले लगाता है।

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इस अवस्था में लड़के और लड़कियों दोनों में शारीरिक बदलाव शुरू होनें लगते हैं। ये सभी शारीरिक परिवर्तन शरीर में हार्मोन्स के बनना शुरू होने की वजह से होते हैं। लड़कों में प्रमुख रूप से टेस्टोस्टेरोन और लड़कियों में प्रमुख रूप से ऑक्सीटोसिन और प्रोजेस्टेरोन नामक हार्मोन्स स्त्रावित होते हैं।

इन्ही हार्मोन्स की वजह से लड़कों में उनके कद का बढ़ना, हड्डियों तथा मांसपेशियों का विकास होना, शरीर पर बाल आना, बगलों में बाल आना, दाढ़ी और मूछ का बढ़ना, योनांगो का विकसित होना और उनपर बाल आना, आवाज का भारी होना, चेहरे पर कील मुहासों का आना, आदि कुछ प्रमुख लक्षण होते हैं।

इसी प्रकार लड़कियों में उनके कद का बढ़ना, योनांगो का विकसित होना तथा उनपर बाल आना, बगलों में बाल आना, स्तनों का विकास होना, जांघो और नितम्बो का भारी होना, मासिक धर्म का शुरू होना, आवाज का पतला होना, चेहरे पर कील मुहासों का आना, आदि कुछ प्रमुख लक्षण होते हैं।

यह अवस्था काफी महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इसी अवस्था में चरित्र का निर्माण होता है। हार्मोन्स की वजह से शारीरिक बदलाव के साथ-साथ बहुत से मानसिक बदलाव भी परिलक्षित होने लगते हैं जैसे बात-बात में तर्क करना, किसी भी बात को आसानी से न मानना, जिद करना, नई नई इच्छाओं का पैदा होना, कामुकता का पैदा होना, विषमलिंगी के प्रति आकर्षण पैदा होना, आदि।

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किशोरावस्था शारीरिक और मानसिक परिपक्वता की उम्र होती है जिसमे किशोर की भावना और विचारों को समझना बहुत आवश्यक है।

यदि इस उम्र में सही ध्यान देकर उचित मार्गदर्शन नहीं किया गया तो फिर भटकना बहुत आसान हो जाता है। इस उम्र में कुछ नया करने करने की इच्छा होती है अतः दुर्गुण सबसे पहले घेरने लगते हैं।

अभिभावकों को चाहिए कि वो किशोर बच्चों को पास बैठाकर प्यार से उनकी बात सुने और समझे, अपनी इच्छाएँ उन पर ना थोपें, शारीरिक परिवर्तनों के बारे में उन्हें शिक्षित करें, भावनात्मक और मानसिक संबल प्रदान करें।

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किशोरावस्था ही एक ऐसी अवस्था होती है जिसमे बच्चों की शैक्षिक प्रगति की दिशा और दशा तय होती है क्योंकि करियर की सही राह चुननें का समय इसी अवस्था के बीच से गुजरता है।

किशोरावस्था में अत्यधिक शारीरिक और मानसिक ऊर्जा का आभास होता है और अगर हम इस ऊर्जा को सकारात्मक दिशा दिखा पाएंगे तो वह प्रगति के पथ की तरफ अग्रसर करती है अन्यथा नकारात्मकता की तरफ धकेलकर नष्ट कर देती है।

अतः किशोरों से ज्यादा हम अभिभावकों की जिम्मेदारी बनती हैं कि हम उन्हें सही और गलत की पहचान कराकर उनका उचित मार्गदर्शन करें। किशोर तो कच्ची मिट्टी और कोरे कागज की मानिंद होते हैं जिनको किसी भी आकार में ढाला जा सकता है और उनपर कुछ भी लिखा जा सकता है।

किशोरावस्था जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव Adolescence is crucial stage of life

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