क्या परिवार नियोजन की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं की है?

क्या परिवार नियोजन की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं की है - प्रजनन क्षमता महिलाओं को जननी का रूप प्रदान करती है परन्तु बहुत बार यही प्रजनन क्षमता महिलाओं के लिए अतिरिक्त दर्द का एक हिस्सा भी बन जाती है।

भगवान ने महिलाओं को लेबर पैन, डिलीवरी तथा गर्भपात जैसी पीड़ाएँ दी हैं तथा इन पीड़ाओं को सहन करने के लिए बहुत अधिक क्षमता तथा सामर्थ्य भी प्रदान किया है।

ये सभी पीड़ाएँ प्राकृतिक है तथा इसमें किसी का कोई जोर भी नहीं चलता है परन्तु महिलाओं को कुछ ऐसी भी पीड़ाओं का सामना करना पड़ता है जिनको अगर पुरुष चाहे तो टाला जा सकता है उस पीड़ा का नाम है नसबंदी।

लेबर पैन, डिलीवरी तथा गर्भपात जैसे दर्द पुरुष द्वारा बाँटे नहीं जा सकते हैं परन्तु नसबंदी का दर्द ऐसा दर्द होता है जिसे बाँटा जा सकता है।

वैसे भी देखा जाए तो परिवार नियोजन की सम्पूर्ण जिम्मेदारी पुरुषों पर ही होती है परन्तु पुरुष इसमें अपनी भूमिका सही ढंग से नहीं निभाते हैं। इस भूमिका को भी महिलाओं को ही निभाना पड़ रहा है तथा पुरुष इसमें भी कन्नी काट लेते हैं।

भारत के लगभग हर राज्य में सरकार के नसबंदी के 99 प्रतिशत से भी अधिक लक्ष्य महिलाओं की वजह से पूरे हो रहे है तथा पुरुषों का उसमे 1 प्रतिशत से भी कम योगदान है।

संतानोत्पत्ति की जिम्मेदारी महिला तथा पुरुष दोनों की होती है परन्तु नसबंदी की जिम्मेदारी अधिकतर महिलाओं पर ही डाल दी जाती है जबकि पुरुष नसबंदी में दर्द तथा खतरा काफी कम होता है।

पुरुष नसबंदी को वेसेक्टोमी (Vasectomy) तथा महिला नसबंदी को ट्यूबेक्टोमी (Tubactomy) कहा जाता है। पुरुष नसबंदी में पुरुष के जनन अंग के आतंरिक हिस्से वास डेफेरेंस (Vas deferens) की नली को बाँध कर बंद कर दिया जाता है।

महिला नसबंदी में महिला के जनन अंग के हिस्से फेलोपियन ट्यूब (Fallopian tube) को बाँध दिया जाता है। महिला नसबंदी के बनिस्पत पुरुष नसबंदी अधिक सुरक्षित, दर्द रहित तथा कुछ मिनटों में हो जाती है।

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पुरुषों के नसबंदी नहीं करवाने के पीछे कुछ कारण है जिनमे सबसे प्रमुख कारण पुरुषों की यह गलत धारणा कि नसबंदी करवाने के पश्चात उनका पुरुषत्व कम हो जाता है।

यह सरासर मिथ्या धारणा है तथा नसबंदी करवाने से पुरुषत्व का कोई सम्बन्ध नहीं होता है। यह अलग बात है कि प्रकृति ने महिलाओं को शारीरिक रूप से भले ही पुरुषों के मुकाबले कमजोर बनाया है परन्तु उन्हें सहनशीलता, सामर्थ्य तथा पुरुष के पुरुषत्व को परखने की क्षमता बहुत अधिक प्रदान की है।

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दूसरा कारण यह है कि हमारा समाज पुरुष प्रधान है तथा महिलाओं से जुड़े हुए निजी मामलों में भी पुरुष की रजामंदी जरूरी होती है। पुरुष प्रधान समाज होने के कारण पुरुष महिलाओं को अपनी आज्ञाकारी अनुचर समझते हैं।

एक तो पुरुष दर्द सहन करने में महिलाओं के मुकाबले कमजोर होता है तथा दूसरा यह है कि पुरुष को महिला के रूप में बहुत आसान विकल्प भी मिल जाता है जिनके कारण नसबंदी की सारी जिम्मेदारी महिला पर बिना उसकी इच्छा जाने थोप दी जाती है।

हमारे समाज में महिला को पैदा होने से लेकर मृत्यु तक अपने निजी निर्णय लेने का अधिकार भी बमुश्किल मिलता है, तब हम उस समाज से यह कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि नसबंदी की पीड़ा तथा जिम्मेदारी पुरुष वहन करेंगे।

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हमें इन सभी स्थितियों को बदलना होगा तथा मध्ययुगीन भ्रांतियों को छोड़कर आधुनिक सोच के साथ जीवन जीना होगा। हमें यह सोचना चाहिए कि औरत, माँ, पत्नी, बहन आदि सभी रूप में पुरुष का बहुत ध्यान रखती है, उसकी परेशानियों तथा दर्द को बाँटने के लिए हर वक्त तैयार रहती है।

तो क्या पुरुषों की यह जिम्मेदारी नहीं बनती है कि वे महिलाओं के इस अतिरिक्त दर्द को तो कम से कम बाँट ले?

क्या परिवार नियोजन की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं की है? Are only women responsible for family planning?

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