राजस्थान फार्मेसी कौंसिल के चुनाव में फार्मासिस्टों के मुद्दे

आजादी के समय से ही राजस्थान शिक्षा तथा स्वास्थ्य के क्षेत्र में काफी पिछड़ा हुआ प्रदेश है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो आज भी हालात इतने विकट बने हुए हैं कि लोगों को शिक्षा तथा स्वास्थ्य प्राथमिक रूप से भी उपलब्ध नहीं हैं। लोग स्वास्थ्य तथा शिक्षा के मानवीय अधिकारों से भी वंचित होते जा रहे हैं।

शहरों में गाँवों के मुकाबले परिस्थितियाँ काफी बेहतर है परन्तु फिर भी संतुष्टिपूर्ण नहीं कही जा सकती है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में चिकित्सकों तथा नर्सिंगकर्मियों सहित अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका को ना तो नकारा जा सकता है तथा ना ही उनकी भूमिका का कोई अन्य विकल्प मौजूद हो सकता है परन्तु फिर भी अधिकारों की लड़ाई हमेशा बनी रहती है।

हमेशा से चिकित्सा के क्षेत्र में डॉक्टर तथा नर्सिंग कर्मियों का ही पूर्ण वर्चस्व बना हुआ है और अपने इसी वर्चस्व के चलते ये लोग उन सभी कार्यों को भी अंजाम देते थे जो इनके अधिकार क्षेत्र में आते ही नहीं थे जैसे अस्पतालों तथा अन्य जगह दवाइयों की देखरेख, वितरण तथा भंडारण आदि। यानि दवा से सम्बंधित सभी प्रकार के कार्य इन लोगों की देख रेख में ही संपन्न होते आए हैं।

फिर वर्ष 2011 में राजस्थान सरकार ने सरकारी अस्पतालों में फार्मासिस्ट की भर्ती सुनिश्चित की तथा लगभग डेढ़ हजार फार्मासिस्ट राजस्थान सरकार के अस्पतालों में नियुक्ति पा सके। इस भर्ती के साथ ही राजस्थान में भी फार्मासिस्टों के लिए सरकारी सेवा के नए अवसर बने अन्यथा इससे पूर्व फार्मासिस्टों के लिए राज्य सेवा में जाने के लिए कोई अवसर उपलब्ध नहीं थे।

इस भर्ती का प्रभाव बहुत से लोगों पर पड़ना तय था तथा विशेषकर उन लोगों पर जो फार्मासिस्टों के अधिकारों पर कब्ज़ा जमा कर बैठे थे। फार्मासिस्ट के अस्पतालों के अन्दर आ जाने से पुराने कार्यरत डॉक्टर्स तथा नर्सिंग कर्मचारियों को अपने अधिकारों में कटौती का भय सताने लगा क्योंकि अस्पतालों से दवाओं के ऊपर से अब इनका अधिकार समाप्त होना तय था।

फार्मासिस्ट की नियुक्ति से पूर्व अस्पतालों में दवाओं की खरीद, भंडारण, वितरण तथा पेशेंट कोउन्सल्लिंग जैसे महत्वपूर्ण कार्य मुख्यतया डॉक्टर्स तथा नर्सिंग कमियों के हाथों में थे जो कि दवाओं की हैंडलिंग से पूर्णतया अप्रशिक्षित तथा अनभिज्ञ थे। इन लोगों को अप्रशिक्षित कहने का तात्पर्य इनकी काबिलियत पर प्रश्न चिन्ह लगाना कतई नहीं है, ये लोग अपने क्षेत्र में बहुत काबिल हो सकते हैं परन्तु ये लोग उस क्षेत्र में कदापि काबिल नहीं हो सकते जिसके बारे में इन्होंने पढाई नहीं की हो तथा विधिवत प्रशिक्षण नहीं पाया हो। एक डॉक्टर बेहतरीन डॉक्टर हो सकता है, एक नर्स बेहतरीन नर्स हो सकती है परन्तु एक डॉक्टर या नर्स बेहतरीन फार्मासिस्ट नहीं हो सकते हैं।

दवा क्षेत्र का हाथ से निकलना तथा एक नई शिक्षित कम्युनिटी का हॉस्पिटल में प्रवेश बहुत से लोगों की आँखों में खटकने की प्रमुख वजह बन गया था जिसकी वजह से ये लोग फार्मासिस्ट की आवश्यकता को गैरजरूरी साबित करने में भी लग गए थे। ऐसा नहीं है कि सभी डॉक्टर्स की नजर में फार्मासिस्ट गैरजरूरी लोग थे अगर ऐसा होता तो राजस्थान में मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना की शुरुआत भी नहीं हुई होती क्योंकि इसे शुरू करने में भी एक डॉक्टर, श्री समित शर्मा, जो कि आईएएस भी थे, उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है। इसी योजना को एक आधार बनाकर सरकारी हॉस्पिटल्स में फार्मासिस्टों की नियुक्ति की मांग की गई तथा आज भी की जा रही है।

फार्मासिस्टों के सामने आज दूसरे हेल्थ प्रोफेशनल्स के अतिरिक्त अन्य कई समस्याएँ पैदा हो रही है जिनका निवारण समय रहते किया जाना अत्यंत आवश्यक है अन्यथा यह क्षेत्र और अधिक गर्त में चला जाएगा। हमारे विचार में फार्मासिस्टों की प्रमुख समस्याएँ कुछ इस प्रकार से हैं:

फार्मासिस्टों के सामने सबसे बड़ी समस्या रोजगार की समस्या है। अगर वास्तव में देखा जाए तो फार्मेसी की शिक्षा की संरचना रोजगार लेने के लिए नहीं बल्कि रोजगार देने के लिए है शायद इसी वजह से आज तक फार्मेसी में डिप्लोमा तथा डिग्री होल्डर विद्यार्थियों के लिए राज्य, केंद्र तथा निजी क्षेत्र में रोजगार के बहुत कम अवसर उपलब्ध रहे हैं। दुनिया में शायद फार्मेसी की पढाई ही ऐसी पढाई रही है जिसमे प्रथम वर्ष में फार्मेसी के स्कोप के सम्बन्ध में पढाया जाता रहा है।

फार्मेसी में डिप्लोमा करने के पश्चात सर्वप्रमुख कार्य स्वयं का मेडिकल स्टोर शुरू करना है। यह जरूरी नहीं कि जो विद्यार्थी डी फार्म करे वो आर्थिक रूप से इतना सक्षम हो कि वह पाँच-दस लाख रूपए खर्च कर स्वयं का मेडिकल स्टोर खोल सके। अगर विद्यार्थी स्वयं का मेडिकल स्टोर नहीं खोल सकता है तो उसके सामने सिवाए दवा कंपनी में मार्केटिंग के अन्य कोई रास्ता नहीं खुला रहता है। जब कोई विद्यार्थी यह दोनों कार्य नहीं कर पाता है तो वह (बहुत से लोग अन्य जगह कार्यरत रहते हुए भी) अपनी मेहनत से अर्जित उस शिक्षा को एक सर्टिफिकेट के रूप में किसी संपन्न दवा व्यापारी की दुकान पर गिरवी रख देते हैं।

कमोबेश यही हालात फार्मेसी में डिग्री होल्डर्स के साथ होती हैं, बस थोडा सा अंतर आ जाता है। कहने को डिग्री होल्डर्स के लिए रोजगार के अन्य कई अवसर और होते हैं जैसे सरकारी क्षेत्र में ड्रग इंस्पेक्टर्स, गवर्नमेंट एनालिस्ट आदि। परन्तु यहाँ भी हालात अधिक ठीक नहीं है क्योंकि राजस्थान में ड्रग इंस्पेक्टर की वैकेंसी दशकों के अंतराल पर निकलती है जिसका जीवंत उदाहरण गहलोत सरकार के अंतिम वर्ष में निकली हुई विज्ञप्ति का वसुंधरा सरकार के अंतिम वर्ष में पूर्ण होना है।

दूसरा हजारों बेरोजगार डिग्री होल्डर्स के लिए पचास साठ पद ऊंट के मुह में जीरे के समान ही है। गवर्नमेंट एनालिस्ट की भर्ती तो निकलती ही नहीं है और हद तो तब हो गई जब फार्मासिस्ट को एनालिस्ट की भर्ती के योग्य भी नहीं समझा गया था।

आज के समय में ले देकर डिप्लोमा तथा डिग्री होल्डर्स के सामने सिर्फ और सिर्फ सरकारी अस्पतालों में फार्मासिस्ट की भर्ती ही एकमात्र सरकारी रोजगार का जरिया है। राजस्थान में फार्मासिस्ट सरकारी अस्पतालों में भर्ती के लिए भी संघर्षरत है क्योंकि सरकारी अस्पतालों में लगभग सोलह हजार से अधिक ड्रग डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर (डीडीसी) होने के बाद में भी सरकार फार्मासिस्ट की भर्ती उस अनुपात में नहीं कर रही है। आज भी कुछ हजार फार्मासिस्टों के अलावा दवा वितरण तथा भंडारण का कार्य नर्सिंग कर्मी ही कर रहे हैं। सभी फार्मासिस्टों को एक होकर अपने अधिकारों के लिए लड़ना होगा।

अब एक तरफ तो सरकार नई भर्ती नहीं निकाल रही है, दूसरा फार्मासिस्टों में भर्ती के नियमों को लेकर आपस में टकरार होनी शुरू हो गई है। जो लोग संविदा पर कार्यरत हैं, वे लोग भर्ती को मेरिट के आधार पर तथा जो लोग फ्रेशर है, वे भर्ती को परीक्षा के द्वारा संपन्न करवाने की बात कह रहे हैं। यह तकरार बढ़ते-बढ़ते सरकार तक पहुँच चुकी है जिसका परिणाम नई भर्तियों में देरी के रूप में सामने आ रहा है।

ऐसा नहीं है कि मतभेद सिर्फ बेरोजगार फार्मासिस्टों में ही हो रहा है, मतभेद की इस रस्म को सेवारत फार्मासिस्ट भी पूरी तरह निभा रहे हैं। सेवारत फार्मासिस्टों में अपने कैडर को लेकर आपस में तकरार शुरू हुई जो बढती ही जा रही है। डिप्लोमा तथा डिग्री होल्डर्स फार्मासिस्टों के अलग-अलग खेमें बँट चुके है जो अपने-अपने हितों को साधने में लगे हुए हैं। डिप्लोमा होल्डर्स अनुभव तथा वरिष्ठता (सीनिओरिटी) के आधार पर पदोन्नति चाहते हैं जबकि डिग्री होल्डर्स अपनी उच्च शिक्षा का फल चाहते हैं।

यह आपसी मतभेद सभी को मिल जुलकर हल कर लेने चाहिए और याद रखना चाहिए कि बिल्लियों की लड़ाई में फायदा हमेशा बन्दर का ही होता है। वैसे डिग्री होल्डर्स को भी समझना चाहिए कि अगर कोई उच्च शिक्षित व्यक्ति क्लर्क की नौकरी के लिए आवेदन करता है तो वह सारी उम्र क्लर्क की ग्रेड में ही रहेगा उसकों उसकी उच्च शिक्षा की वजह से पदोन्नति नहीं मिलती है। जब पीएचडी तथा एम फार्म डिग्री होल्डर्स ने डिप्लोमा स्तर की नौकरी के लिए आवेदन किया है तथा वे उसी स्तर पर चुने गए हैं तो उन्हें अपनी उच्च शिक्षा का हवाला कतई नहीं देना चाहिए।

यह तो उच्च शिक्षित व्यक्तियों की नाकाबिलियत का परिचायक ही कहा जा सकता है कि वे निम्न शिक्षित व्यक्तियों का हक मार रहे हैं। एम फार्म तथा पीएचडी की डिग्री अस्पतालों में दवाई बाँटने के लिए कतई नहीं ली जाती है।

कैडर का हल डिप्लोमा तथा डिग्री होल्डर्स के लिए अलग-अलग पोस्ट निकाल कर किया जा सकता है। डिप्लोमा होल्डर्स को फार्मासिस्ट सेकंड या थर्ड तथा डिग्री होल्डर्स हो फार्मासिस्ट फर्स्ट या सेकंड कहा जा सकता है। अस्पताल में फार्मासिस्ट की भर्ती ही उसकी बेसिक शिक्षा के अनुसार होनी चाहिए तथा उच्च शिक्षित व्यक्ति को पहले तो निम्न शिक्षित व्यक्तियों की भर्तियों में बैठने का मौका ही नहीं मिलना और अगर मौका दिया जा रहा है तो इस प्रकार की व्यवस्था करनी चाहिए कि उन्हें उनकी शिक्षा का कोई फायदा नहीं मिले। कुल मिलाकर डिप्लोमा तथा डिग्री होल्डर्स के अधिकारों का समुचित रूप से विभाजन हो जाना चाहिए ताकि हम आपस में ना लड़कर व्यवस्था से लड़ सकें।

सरकारी क्षेत्र में उच्च शिक्षित व्यक्तियों के लिए उनकी योग्यता अनुसार पदों का सृजन होना चाहिए जैसे चीफ फार्मासिस्ट के लिए भर्ती प्रवेश परीक्षा से होनी चाहिए जिसकी न्यूनतम योग्यता एम फार्म या जरूरत के अनुसार बी फार्म हो सकती है। पीएचडी वालों को रिसर्च या टीचिंग में ही अपना भविष्य देखना चाहिए।

निजी क्षेत्र में डिग्री होल्डर फार्मासिस्ट के सामने बहुत सी समस्याएँ हैं। एक तो फार्मेसी शिक्षा में बाबा आदम के जमाने का सिलेबस पढाया जाता है। डिप्लोमा के सिलेबस में बदलाव हुए सत्ताईस वर्ष हो गए हैं। जो पढाई डिप्लोमा स्टूडेंट करता है वो वास्तविक रूप में कही भी काम नहीं आ रही है। ऐसा ही हाल डिग्री की पढाई का था परन्तु उसमे पिछले वर्ष से बदलाव किया गया है।

हमारी पढाई ना तो मार्किट ओरिएंटेड है और ना ही इंडस्ट्री ओरिएंटेड है, जो कुछ हमारे विद्यार्थियों को पढाया जा रहा है वह प्रैक्टिकल रूप से कहीं भी काम नहीं आ रहा है और परिणामतः फार्मेसी के विद्यार्थियों को गैर फार्मेसी के विद्यार्थियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। आखिर यह सामना क्यों नहीं होगा, जब हम पढ़ लिखकर भी उनके बराबर ही ज्ञान रखेंगे तो यही होगा।

इस अज्ञानता की शुरुआत शैक्षिक संस्थानों से होती है। एक तो फार्मासिस्ट के लिए पहले ही सीमित अवसर हैं उस पर कुकुरमुत्तों की तरह अनाप शनाप नए-नए कॉलेज खुलते जा रहे हैं। शिक्षा एक व्यवसाय का रूप ले चुका है तथा इसमें नए-नए व्यापारी पैसा लगाकर पैसा कमा रहे हैं। इन लोगों को अपने मुनाफे से मतलब है तथा इन्हें शिक्षा के स्तर से कोई लेने देना नहीं है।

संस्थानों में ना तो विद्यार्थियों के लिए समुचित रूप से टीचर्स की व्यवस्था है तथा ना ही केमिकल्स तथा अन्य संसाधनों की। टीचर्स को सरकारी क्षेत्र के फोर्थ क्लास से भी कम वेतन पर नियुक्ति पर रखा जाता है। कई जगह तो अधिक वेतन देकर हस्ताक्षर करवा लिए जाते हैं तथा बाद में पैसा वापस ले लिया जाता है। जिस प्रकार का वातावरण निजी स्कूलों में था ठीक उसी प्रकार का वातावरण फार्मेसी कॉलेजों में बनता जा रहा है। टीचर से टीचिंग कम अन्य कार्य जैसे एडमिशन के लिए बच्चे ढूँढना, उनके अभिभावकों को फोन कर उन्हें एडमिशन के लिए मनाना आदि हो गए हैं।

इन सभी कार्यों की भनक फार्मेसी कौंसिल ऑफ इंडिया को भी है क्योंकि जब इनके इंस्पेक्टर्स कॉलेज का इंस्पेक्शन करने आते हैं तो परिस्थितियाँ साफ-साफ नजर आ जाती हैं। सामान्यतया पीसीआई के इंस्पेक्टर्स भी टीचर्स ही होते हैं तथा इनसे कुछ भी छुपा हुआ नहीं होता है परन्तु ये भी या तो अपनी मजबूरियों के चलते या फिर इंस्पेक्टर बनने की खुशी में सब कुछ नजरअंदाज कर देते हैं।

कहते हैं कि कोई व्यक्ति अगर किसी भी तरह का इंस्पेक्टर बन जाता है तो उससे बड़ा खुशनसीब इंसान कोई नहीं होता है। फार्मेसी कौंसिल की अकर्मण्यता का आलम यह है कि शायद ही इसने आज तक अनियमतता के चलते किसी कॉलेज को बंद किया हो। फार्मेसी कौंसिल को सभी कॉलेज नियमों के अनुसार चलते हुए नजर आ रहे हैं।

एक सेवारत चिकित्सक अपनी ड्यूटी पूर्ण करने के पश्चात अपने घर पर नियमित रूप से मरीजों को देखता है। मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया तथा सरकार की नजर में यह सब वैधानिक है परन्तु एक फार्मासिस्ट किसी प्राइवेट कॉलेज में टीचिंग करते हुए अपनी ड्यूटी के पश्चात मेडिकल स्टोर भी शुरू नहीं कर सकता है क्योंकि फार्मेसी कौंसिल ऑफ इंडिया की नजर में यह अवैधानिक है।

फार्मेसी कौंसिल ऑफ इंडिया की तरफ से कार्यरत शिक्षक से स्टाम्प पेपर पर टीचिंग के अतिरिक्त अन्य कोई कार्य नहीं करने का सेल्फ अटेस्टेड डिक्लेरेशन लिया जाता है। क्या कोई टीचर या अन्य सेवारत फार्मासिस्ट अपनी ड्यूटी के पश्चात मेडिकल स्टोर पर अपनी सेवाएँ नहीं दे सकता है?

दवा के खुदरा तथा होलसेल व्यापार में भी फार्मासिस्टों का वर्चस्व नहीं है। आज भी दवा व्यापार पर व्यापारियों का ही कब्जा बना हुआ है। ये व्यापारी अपने आपको केमिस्ट कहते हैं तथा हम फार्मासिस्ट भी जाने अनजाने इन्हें केमिस्ट ही कहते हैं। आखिर ये दवा व्यापारी केमिस्ट कैसे हुए? क्या कोई अनपढ़ व्यापारी फार्मासिस्ट का लाइसेंस किराये पर लेकर केमिस्ट बन सकता है? अगर बन सकता है तो फिर फार्मासिस्ट को न्यूनतम दो वर्षों का कोर्स करने की जरूरत क्या है? हमें भी बिना फार्मेसी में डिप्लोमा या डिग्री किए मेडिकल स्टोर शुरू कर केमिस्ट बन जाना चाहिए था, हमने पढाई क्यों की?

दरअसल केमिस्ट और फार्मासिस्ट दोनों का मतलब एक ही होता है तथा सभी फार्मासिस्टों को यह दिमाग में बैठा लेना चाहिए कि वो फार्मासिस्ट होने के साथ-साथ केमिस्ट भी हैं चाहे उन्होंने मेडिकल शॉप खोल रखी है या नहीं। जिस प्रकार हॉस्पिटल शुरू करने से कोई डॉक्टर नहीं बन जाता ठीक उसी प्रकार केवल दुकान शुरू करने से कोई केमिस्ट नहीं बन जाता है। दवा व्यापारी सिर्फ उस दुकान के प्रोपराइटर मात्र है अतः हमें इन्हें केमिस्ट कहना बंद करना होगा तथा इस बात पर आपत्ति जतानी होगी। ये नाम हमारी पहचान है अतः हमें खुद ही इसे किसी और के हवाले नहीं करना चाहिए।

यह एक बड़ी विडम्बना है कि डॉक्टर भी होलसेल व्यापारियों से दवा खरीद कर अपने मरीजों को बेच सकता है। आखिर किस अधिकार से डॉक्टर्स द्वारा ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है? कोई डॉक्टर कैसे अपने मरीज को लाखों की दवाइयाँ बेच सकता है? क्या डॉक्टर इसके लिए बिल काट कर देता है? बहुत से बच्चों के डॉक्टर छोटे बच्चों को वैक्सीन अपने पास से ही लगाते हैं। इस लगाईं हुई वैक्सीन का वो अपनी कंसल्टेशन फीस की तरह कोई बिल भी नहीं देते हैं।

ऐसे डॉक्टर के लिए फार्मासिस्ट की जरूरत कहाँ रह जाती है? एक तरफ तो हम कहते हैं कि जहाँ दवा वहाँ फार्मासिस्ट, दूसरी तरफ हम आँख मूँद कर इस मुद्दे का समर्थन कर रहे हैं। हमें सभी होलसेल व्यापारियों के लिए यह अनिवार्य करवाना होगा कि वो दवा सिर्फ और सिर्फ ड्रग लाइसेंस नंबर पर ही दें ना कि डॉक्टर के रजिस्ट्रेशन नंबर पर। जब हम डॉक्टर के कार्य को नहीं कर सकते हैं तो फिर डॉक्टर या नर्सिंग कर्मी कैसे हमारे कार्य को कर सकता है?

राजस्थान फार्मेसी कौंसिल के चुनाव होने वाले हैं जिसकी प्रक्रिया में भी सुधार होना आवश्यक है। चुनाओं में ऐसे फार्मासिस्ट भी खड़े हो सकते हैं जो सरकारी सेवा में कार्यरत होते हैं जैसे सरकारी टीचर या ड्रग डिपार्टमेंट से ड्रग इंस्पेक्टर्स तथा अब नवनियुक्त फार्मासिस्ट आदि। क्या सरकारी सेवा में रहने वाले व्यक्ति का चुनाव लड़ना वैधानिक है? ड्रग डिपार्टमेंट तथा ड्रग इंस्पेक्टर्स से मेडिकल स्टोर संचालकों का काम पड़ता रहता है जिसके कारण चुनावी निष्पक्षता खतरे में पड़ सकती है। कहते हैं कि पद तथा पैसा सब कुछ करवा सकता है।

अभी तक सभी फार्मासिस्टों को बैलट पेपर डाक द्वारा उनके पते पर भेजा जाता है, जिसे वह अपने पसंद के प्रत्याशियों के नाम के आगे निशान लगाकर डाक द्वारा या व्यक्तिगत रूप से वापस भेज सकता है। यह व्यवस्था भी बदलनी चाहिए क्योंकि पुराने चुनावों में कई बार यह आरोप लगे थे कि प्रत्याशियों के लिए खाली बैलट पेपर इकट्ठे किए गए थे।

मतदान का कोई अन्य सुरक्षित तथा निष्पक्ष तरीका होना चाहिए परन्तु जब तक राजस्थान फार्मेसी कौंसिल स्वयं ही सवालों के घेरे में रहती है तथा अपने आप को आरटीआई के दायरे से दूर रखने के लिए जी जान से प्रयासरत है तब तक कुछ भी सोचना शायद बेमानी है।

राजस्थान के सभी फार्मासिस्टों को केवल यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे राजस्थान फार्मेसी कौंसिल के चुनाओं में सिर्फ और सिर्फ उन प्रत्याशियों को ही चुने जो फार्मासिस्ट हित में कार्य कर रहे हैं, जिनकी वजह से सरकारी क्षेत्र में रोजगार पैदा हो रहे हैं तथा जो एसी कमरों में ना बैठकर बेरोजगार फार्मासिस्टों के अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं।

राजस्थान फार्मेसी कौंसिल के चुनाव में फार्मासिस्टों के मुद्दे Issues of pharmacists in the rajasthan pharmacy council election

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