मन के हारे हार है, मन के जीते जीत

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत - “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत” जिसने भी ये कहा है बहुत गहरी बात कही है।


जब तक मन हार नहीं मानता है तब तक इंसान में इच्छा शक्ति बनी रहती है या फिर यूँ कहें कि जब तक दृढ़ इच्छा शक्ति होती है इंसान में हौसला बना रहता है, जब तक हौसला बना रहता है तब तक इंसान किसी भी कार्य को करने में अपने आप को सक्षम समझता है।


जब मन हार मान लेता है तब इच्छाएँ और हौसले भी पस्त हो जाते हैं और इंसान निढाल होकर अकर्मण्यता की तरफ अग्रसर हो जाता है।


मन में जब उमंगे हिलोरे मारती रहती है और प्रतिफल की सकारात्मक उम्मीद बलवती होती जाती है तब कर्म को भी पूरी तन्मयता के साथ किया जाता है।


तन्मयता और उमंगो का सम्बन्ध किसी भी प्रतिफल की सकारात्मक प्राप्ति पर टिका रहता है और जब-जब ये प्रतिफल नकारात्मकता में परिवर्तित होने लगता है तब-तब हमारा मन हारना शुरू कर देता है। मन के हारने के साथ ही शरीर में नकारात्मक ऊर्जाओं का बढ़ना शुरू हो जाता है।


नकारात्मक विचार निराशा में बदलनें लगते हैं और इंसान के जीवन में उम्मीदों का टूटना शुरू हो जाता है। वह हर परिस्थिति में नकारात्मक पहलू देखने लगता है और उसकी जोखिम उठाने और सहन करने की ताकत समाप्त हो जाती है।


जब जोखिम उठाने का सामर्थ्य नहीं रह जाता है तब सफलता प्राप्त होना बहुत मुश्किल हो जाता है। सफलता प्राप्त करने के लिए जोखिम उठाने का सामर्थ्य कूट कूट कर भरा होना चाहिए क्योंकि जब तक घोड़े पर बैठने का जोखिम नहीं उठाएंगे तब तक घुड़सवारी नहीं सीख पाएंगे।


घुड़सवारी सीखने के लिए घोड़े पर बैठने का जोखिम तो लेना ही होगा, बिना घोड़े पर चढे कोई भी घुड़सवारी नहीं सीख सकता।


इसी प्रकार बिना सकारात्मक दिशा में कर्म किये सकारात्मक परिणाम प्राप्त होना असंभव होता है। गीता में भगवान कृष्ण ने भी कर्म का महत्त्व समझाकर कर्म को ही प्रधान बताया है।


जब हमारे कर्म सही दिशा और मन माफिक होते है तब हमें उसमे एक प्रकार के रस की अनुभूति होने लगती है और मन आनंदित होने लग जाता है।


विधार्थी जब पढाई को सुनियोजित ढंग से प्रारंभ करता है तो धीरे-धीरे उसे उसमे आनंद की प्राप्ति होने लग जाती है और उसका मन पढ़ने में और ज्यादा लगने लग जाता है। धीरे धीरे उसके दिल और मस्तिष्क से पढाई का भय हवा हो जाता है।


इसी प्रकार जब मन प्रभु भक्ति में लीन हो जाता है तब भी परमानन्द की अनुभूति होती है और प्रभु से साक्षात्कार की संभावनाएं बलवती होती जाती है। इसलिए सफलता और असफलता, आशाएँ और निराशाएँ, उम्मीद और नाउम्मीदी आदि सभी हमारे मन और मनोभावनाओं पर टिकी होती हैं।


जब मन प्रसन्न होता है और उसमे सकारात्मक विचारों का उदभव और परागमन होता है तब किसी भी कार्य को करने का मन बनने लगता है।


जिन व्यक्तियों का मन हार नहीं मानता है वे विषम से विषम परिस्थितियों को अनुकूल परिस्थितियों में परिवर्तित कर देते हैं और जिनका मन हार मान लेता है तो अनुकूल परिस्थितियाँ भी विषम लगने लगती है।


अतः हमें यही संकल्प लेना चाहिए की परिस्थितियाँ अनुकूल हो चाहे प्रतिकूल हो, हम कभी हार नहीं मानेंगे।


मन के हारे हार है, मन के जीते जीत Defeats and wins depends on mind

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