प्रसन्न रहना जीवन की सबसे बड़ी कला

प्रसन्न रहना जीवन की सबसे बड़ी कला - हर मनुष्य का जीवन के प्रति कुछ न कुछ दृष्टिकोण होता है क्योंकि हर मनुष्य में कभी न कभी वैराग्य से सम्बंधित विचार अवश्य पैदा होते है।

जब संसार से मन उचटने लगता है तब कुछ समय के लिए ही सही, परन्तु मनुष्य अपने जीवन तथा उसके जीने के तरीकों के बारे में पुनः अवश्य विचार करता है।

अगर मनुष्य में विचारशीलता का अभाव होता तो मनुष्य तथा पशु में कोई अधिक अंतर नहीं रह जाता। मनुष्यता तथा पशुता में मुख्यतया विचारशीलता तथा संवेदनशीलता की ही प्रमुख भूमिका होती है। मनुष्य के मनुष्य रहने के लिए विचार तथा भावनाएँ परमावश्यक गुण हैं।

जब सब कुछ मनमाफिक होता रहता है तब मन में किसी भी तरह के वैराग्य सम्बन्धी विचार उत्पन्न नहीं होते हैं और चित्त शांत रहता है।

परन्तु जब कोई भी कार्य मनमाफिक रूप से संपन्न नहीं होता है तब अमूमन वैराग्य तथा जीवन पर ध्यान आकर्षित होता है। इस स्थिति में मनुष्य जीवन के उद्देश्य तथा जीवन जीने के तरीकों के बारे में विचारता है।

सुखी तथा सफल जीवन जीने की कलाओं के बारे में नीचे कुछ संक्षिप्त प्रकाश डाला गया है जिन्हें अपने जीवन में उतारकर संतुष्ट जीवन जिया जा सकता है।

सबसे पहले तो हमें हमारे विचारों में कुछ बदलाव लाना होगा। हम में से बहुत से लोग हमेशा इस तरह के प्रयास में रहते हैं कि वो अपने से परिचित सभी लोगों को खुश रखें। सभी को खुश तथा संतुष्ट रखने के प्रयास में न जाने कब हम अपने जीवन में एक तूफान सा खड़ा कर लेते हैं।

हमें यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि कोई भी मनुष्य इस दुनिया में न तो सभी को खुश रख सकता है तथा न ही सभी को नाराज रख सकता है।

जब योगेश्वर कृष्ण तथा मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जैसे नारायण के अवतार भी सभी को खुश नहीं रख पाए तो फिर साधारण मनुष्य की तो कोई बिसात ही नहीं है।

इसलिए हमें सभी को खुश रखने की आदत को छोड़ना होगा तथा दूसरों को खुश रखने के चक्कर में अपना कीमती समय तथा जीवन बर्बाद करने से बचना होगा। खुद से खूब प्यार कर खुल कर जीवन जिएँ।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि भूतकाल तथा भविष्य की चिंता के बगैर हमेशा वर्तमान में जीने की आदत डालें। अधिकतर लोग हमेशा भूतकाल तथा भविष्यकाल में जीते हैं। हमें यह याद रखना होगा कि भूतकाल सिर्फ और सिर्फ शीख कर सबक लेने तथा गलतियों को सुधारने के लिए है।

भूतकाल की यादों तथा अनुभवों को कभी भी वर्तमान तथा भविष्य को बिगाड़ने के लिए काम में नहीं लेना चाहिए। भूतकाल को कभी भी बदला नहीं जा सकता है, इसलिए यह सोचनीय प्रश्न है कि जिसे बदला नहीं जा सकता उसके लिए पूर्णतया परिवर्तनशील वर्तमान तथा भविष्य को क्यों बिगाड़ा जाए?

ईश्वर ने हमें गुजरे वक्त को याद रखने की क्षमता सिर्फ और सिर्फ अपनी गलतियों को ना दोहराने के लिए दी है। हमें गुजरे जमाने के बॉलीवुड सुपरस्टार राजेश खन्ना की तरह नहीं जीना है जिन्होंने हमेशा अपनी भूली बिसरी स्टारडम को याद करके अपना आगामी सम्पूर्ण जीवन निराशा में जिया।

अतः हमें भूतकाल से केवल सबक लेकर अपनी सकारात्मक ऊर्जा सिर्फ और सिर्फ वर्तमान पर ही लगानी है तथा हमेशा वर्तमान में ही जीना है ताकि हमारा भविष्य सुनहरा बन सके। जिसका वर्तमान अच्छा होता है तो उसके भविष्य के अच्छे होने की गुंजाइश अपने आप बढ़ जाती है।

तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी लोगों को स्वयं के लिए पर्याप्त समय अवश्य निकालना चाहिए। जो व्यक्ति अपने आप के लिए भी समय नहीं निकाल पाता है वह व्यक्ति अपने जीवन के आखिरी पड़ाव पर बहुत पछताता है।

उस समय उसके मन में यही विचार आते हैं कि जब तक मैं जीवन को समझने लगा था तब तक तो मेरा जीवन ही बीत गया।

पुराना वक्त कभी भी लौट कर नहीं आता है। हर उम्र में अलग उमंगें होती हैं जो उस उम्र के बीतने पर वापस कभी नहीं लौटती हैं। बचपन का सुख जवानी में तथा जवानी का सुख बुढ़ापे में कभी नहीं मिल सकता है।

मनुष्य का जीवन क्षण भंगुर है तथा समय चक्र हमेशा मनुष्य को उसकी आयु घटने की सूचना देता रहता है। हमें अपने आप को मशीनी मानव न बनकर ईश्वर की सबसे सुन्दर रचना साबित करना है।

यह तभी हो सकता है जब हम मानव की तरह ही जीवन जिएँ। कहते हैं कि धरती पर मानव जीवन प्राप्त करने के लिए तो देवता भी लालायित रहते हैं, फिर हम इस देवतुल्य मानव जीवन को किसलिए बर्बाद कर रहे हैं?

चौथा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि दुनिया में वो इंसान ही अधिक सफल होते हैं जो सही समय पर गलत काम के लिए ना कहना जानते हैं। जिस काम को करने की हमारी सामर्थ्य नहीं है, हमें उसके लिए बिना सोचे समझे ना कहना आना चाहिए।

बहुत से लोग ना नहीं कह पाते हैं तथा बिना इरादे तथा बिना मन के हाँ किए हुए काम को जब सफलतापूर्वक नहीं कर पाते हैं तो बहुत दुखी होते हैं। सभी को यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि हाँ कहकर दुखी रहने से अच्छा है कि ना कहकर सुखी रहा जाए।

प्रसन्न रहना जीवन की सबसे बड़ी कला

किसी भी चीज के लिए अपनी क्षमता के अनुसार निर्णय लेकर हाँ या ना कहना चाहिए। ना कहने से सामने वाला सिर्फ एक बार ही दुखी या नाराज होता है परन्तु हाँ कहकर किसी कार्य को ढंग से अंजाम तक नहीं पहुँचाने पर सामने वाला हमेशा नाराज रहता है।

अतः हमें किसी को हमेशा नाराज नहीं करना है तथा अपनी क्षमता के अनुसार निर्णय लेना चाहिए।

पाँचवा बिंदु यह है कि सभी तरह की नकारात्मकता से बचना चाहिए। नकारात्मक विचारों तथा नकारात्मक लोगों, दोनों से ही दूरी बना लेने में ही समझदारी होती है।

नकारात्मक व्यक्ति के पास सिवाए भय तथा नकारात्मक विचारों के कुछ नहीं होता है इसलिए नकारात्मक व्यक्ति हमेशा हर नए काम के खतरे से भयग्रस्त रहता है।

किसी भी नए कार्य के भय से कभी भी नहीं घबराना चाहिए तथा हमेशा यह कथन दिमाग में रखना चाहिए कि डर के आगे जीत होती है। अगर सभी मानव नया करने से डरते तो क्या आज इंसान इतनी प्रगति कर पाता?

एक चीज को और समझना होगा कि निंदा तथा नकारात्मकता में बहुत फर्क होता है। निंदक हमेशा होना चाहिए क्योंकि यह हमें हमारी कमियों के बारे में बताकर हमें अच्छा करने की प्रेरणा देता है।

निंदक की तारीफ में तो संत कबीर ने भी कहा है कि “निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय” अर्थात जो हमारी निंदा करता है हमें उसे अधिकाधिक अपने पास रखना चाहिए क्योंकि वह तो बिना पानी और साबुन के हमारी कमियाँ बताकर हमारे स्वभाव को निर्मल करता है।

आखिरी बिंदु यह है कि हमें हर कार्य पूर्ण जिम्मेदारी तथा मनोयोग के साथ संपन्न करना चाहिए। अगर हम किसी कार्य को करने में सक्षम नहीं हैं तो मात्र प्रदर्शन के लिए उसे नहीं करना चाहिए।

जिम्मेदारी से जीवन में अनुशासन पैदा होता है। जिम्मेदारी से किया हुआ असफल कार्य भी मन को पूर्ण संतुष्टि प्रदान करता है तथा असफलता के विश्लेषण करना काफी आसान हो जाता है।

प्रसन्न रहना जीवन की सबसे बड़ी कला Happiness is the greatest art of life

Written by:
Ramesh Sharma

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