आत्मा और परमात्मा का आपसी सम्बन्ध

आत्मा और परमात्मा का आपसी सम्बन्ध - आत्मा और परमात्मा क्या है? परमात्मा कौन है? परमात्मा कहाँ निवास करते हैं? आत्मा का परमात्मा से क्या सम्बन्ध है?

क्या आत्मा सिर्फ इंसान में ही होती है या ये फिर सृष्टी के हर जीव में मौजूद रहती है? क्या इंसान तथा अन्य जीवो की आत्मा में कोई समानता है या फिर ये भिन्न है?

ये कुछ ऐसे गूढ़ प्रश्न है जिनके बारे में हर इंसान ने कभी न कभी पढ़ा होगा या फिर कही न कही सुना होगा। ऐसे प्रश्नों के बारे में सोचकर हम एक अजीब प्रकार की मनोस्थिति में पहुँच जाते हैं और जीवन से मुक्त होने के पश्चात घटने वाली घटनाओं के बारे में विचार करने लग जाते हैं।

अगर हम आत्मा और परमात्मा के बारे में गहनता से चिंतन करे तो हमारे मस्तिष्क में ना-ना प्रकार के विचार और प्रश्न उपजते हैं।

परमात्मा वो अद्वितीय शक्ति है जो इस धरती को ही नहीं वरन इस ब्रह्माण्ड को सुचारू रूप से चलाने के लिए उत्तरदायी है तथा ब्रह्माण्ड का प्रत्येक कण परमात्मा से पैदा हुआ है।

अनंत आकाशगंगाए, अनंत गृह और उपग्रह, अनंत सजीव तथा निर्जीव वस्तुए आदि की जन्मदाता सिर्फ और सिर्फ वो शक्ति है जिसे परमात्मा के नाम से जाना जाता है।

परमात्मा का अर्थ परम आत्मा होता है जिसका अर्थ सबसे महान और सर्वोच्च आत्मा होता है। इसका मतलब परमात्मा वो आत्मा होती है जो इन सभी आत्माओ की पथ प्रदर्शक होती है तथा सभी आत्माएँ परमात्मा के अनुसार चलती है, उसका अनुसरण करने का प्रयत्न करती है।

परमात्मा तो आदि और अनंत हैं तथा आत्मा भी ना पैदा होती है और ना समाप्त होती है। जीव जन्म और मृत्यु के चक्र में फसे रहते हैं तथा उनकी आयु निश्चित होती है और उस निश्चित आयु को पार कर लेने के पश्चात शरीर समाप्त हो जाता है।

शरीर समाप्त हो जाने के पश्चात आत्मा पुनः दूसरा शरीर धारण कर नया जन्म लेती है तथा जीवात्मा कहलाती है।

इस प्रकार जीव जन्म और मृत्यु के चक्र में फंसा रहता है उसे पता ही नहीं रहता कि वो क्यों जन्म लेता है तथा फिर क्यों मृत्यु को प्राप्त को जाता है। आत्मा का परम उद्देश्य परमात्मा में विलीन होना होता है जिससे वो जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सके।

आत्मा और परमात्मा का आपसी सम्बन्ध

परमात्मा ने जीवों की स्मरण शक्ति को सीमित समय के लिए बनाया है अर्थात जीवो में याद रखने की क्षमता एक सीमा तक ही होती है उसके पश्चात वो सबकुछ भूल जाते हैं।

अगर ऐसा नहीं होता तो हमारे शोक मनाने की अवधि जिन्दगी भर चलती रहती तथा हम उन घटनाओ और परिस्थितियों का शोक मनाते रहते जिनको घटे वर्षो बीत चुके होते।

शायद इसी लिए ही समय चक्र की रचना हुई है, तभी तो कहा जाता है की वक्त सबसे बड़ा मरहम होता है। जीव वक्त के साथ साथ सब कुछ भूल जाता हैं और अपनी इसी मनोवृति की बदौलत वो अपने दुखों को भुला पाने में समर्थ होता है।

भूल जाने की इसी मनोवृति की वजह से जीव को अपने पिछले जन्मों के बारे में याद नहीं रहता क्योकि जो वर्तमान जन्म को याद नहीं रख सकता वो पिछले जन्मो को कैसे याद रख पायेगा।

सब कुछ याद रखने की क्षमता सिर्फ परमात्मा में होती है और वो हमारे हर जन्म के कर्मो का हिसाब रखता है। इसी लिए पूर्व जन्म के कर्मो के बारे में जिक्र होता है और कहा जाता हैं कि जिसने पूर्व जन्म में जैसे कर्म किये होते हैं तो उसे अगले जन्म में उसके अनुरूप ही फल भोगना पड़ता है।

सत्कर्मों का फल अच्छा और दुष्कर्मों का फल हमेशा बुरा होता है। हर जीव को दूसरे जीव के प्रति पूर्ण आदर और सदभाव का व्यवहार करना चाहिए फिर चाहे वो इंसान हो या फिर जानवर हो, क्योंकि आत्मा जानवर में भी होती है।

आत्मा और परमात्मा का आपसी सम्बन्ध Relationship between soul and god

Written by:
Ramesh Sharma

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