वैचारिक टकराव का कारण का बुद्धि

वैचारिक टकराव का कारण का बुद्धि - ब्रह्माण्ड के रचयिता ने कभी भी ये कल्पना नहीं की होगी कि उसके द्वारा सृजित जीवन कभी इतना उद्वेलित हो जायेगा कि उसे इन परिस्थितियोँ से बाहर निकलने के लिए भावनात्मक तथा औषधीय सहारा ढूँढना पड़ेंगा।

सृजित जीवन में सिर्फ इंसान ही उद्वेलित जीवन व्यतीत कर रहा है। इंसानों का मन इतना उद्वेलित क्यों रहता है? इंसान का मन हमेशा समुद्री ज्वारभाटे की तरह हलचल में क्यों रहता है तथा वो शांत झील की तरह क्यों नहीं हो सकता?

क्या ये हमारे आधुनिक और पाश्च्यात जीवन की तरफ भागने का नतीजा है? क्या ये हमारे समाप्त होते संबंधो का नतीजा है?

क्या ये सिर्फ इसलिए हैं कि ईश्वर ने हमें सभी प्राणियों में सबसे ज्यादा बुद्धिमान बनाया है और हमारा बुद्धिमान होना ही हमारे लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है?

हमें शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए उपरोक्त सभी प्रश्नों का जबाव ढूँढ़ना ही होगा क्योकि समस्या को समाप्त करने के लिए समस्या के उचित कारण ढूँढकर उन्हें समाप्त करना बहुत ज्यादा आवश्यक होता है।

वैचारिक टकराव का कारण का बुद्धि

मेरी नज़र में हम सभी के ज्यादा उद्वेलित रहने का सबसे बड़ा कारण हमारा ज्यादा बुद्धिमान होना है क्योकि जहाँ बुद्धि होती है वहाँ विचार होते हैं और जहाँ विचार होते हैं वहाँ वैचारिक भिन्नता होती है और जहाँ वैचारिक भिन्नता होती है वहाँ वैचारिक टकराव होता है।

सारी समस्याओं की जड़ ये वैचारिक टकराव ही होता है क्योकि जब वैचारिक समानता का अभाव होना शुरू हो जाता हैं तब प्रेम और संबंधो में गिरावट का दौर शुरू हो जाता है।

हमने देखा है कि जानवरों में बुद्धि और विचारों का अभाव होता है फलस्वरूप उनके जीवन का उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ अपनी क्षुधा को शांत करना होता है, उनमे अगर कभी कोई झगड़ा होता है तो वो सिर्फ भोजन के लिए ही होता है। बुद्धि हमेशा वैचारिक टकराव को जन्म देती है।

प्रकृति के हर हिस्से से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है बशर्ते हम अपनी बुद्धिमता का उपयुक्त इस्तेमाल करे। पर्वत हमें हर हाल में अटल रहना सिखाते हैं, नदियाँ हमें निरंतर निस्वार्थ कर्म करना सिखाती हैं, आसमान हमें सहनशीलता सिखाता है, जानवर हमें सिखाते हैं कि हम अपनी आवश्यकताओं को उनकी तरह से सीमित रखकर उन्मुक्त जीवन जिएँ।

समुद्र में ज्वारभाटे का निश्चित वक्त और कारण होता है परन्तु इंसानी मन के ज्वारभाटों का कोई कारण तथा समय नहीं होता। ये किसी भी कारण से, किसी भी परिस्थिति और किसी भी समय पैदा हो सकते हैं।

मन के ज्वारभाटों को कम करने के लिए हमें मानसिक रूप से मजबूत और सहनशील बनना पड़ेगा, कई बातों और परिस्थितियों को बहुत कम महत्व देना होगा, चारित्रिक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत होना होगा, अपनी जरूरतों को काफी हद तक सीमित रखना होगा।

सबसे प्रमुख बात ये है कि हमें दूसरो से अपनी तथा अपने रहन सहन की तुलना करने की प्रवृति को भी समाप्त करना होगा। ये तुलनात्मक प्रवृतियाँ हमारी मानसिक परेशानियों का शायद प्रमुख कारण हैं।

वैचारिक टकराव का कारण का बुद्धि Wisdom of the cause of ideological conflict

Written by:
Ramesh Sharma

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