असफलता हमारी सबसे बड़ी शिक्षक

असफलता हमारी सबसे बड़ी शिक्षक - आधुनिक युग में सफल व्यक्ति को ही जीने के काबिल समझा जाता है तथा असफल व्यक्ति के लिए यह समझा जाता है कि वह जीने के काबिल भी नहीं है।

सफलता ही जीवन का पैमाना बन गया है तथा सफल व्यक्ति ही सम्मान तथा प्रतिष्ठा का हकदार समझा जाता है।

असफल व्यक्ति को माता पिता से लेकर रिश्तेदार तथा समाज भी कोई तवज्जो न देकर सिर्फ हेय दृष्टि से देखता है। असफलता को एक गुनाह तथा असफल व्यक्ति को एक गुनहगार की भाँति देखा जाता है।

व्यक्ति को सफल होने के पर्याप्त मौके नहीं दिए जाते हैं तथा सभी लोग उस पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ताने मारने लग जाते हैं और उसे यह अहसास करवाया जाता है कि अब वह किसी भी कार्य को करने के लिए उपयुक्त नहीं है। किसी क्षेत्र विशेष में असफल व्यक्ति को हर क्षेत्र में असफल घोषित कर दिया जाता है।

यह जरूरी तो नहीं कि कोई व्यक्ति किसी एक क्षेत्र में सफल नहीं हो तो वह किसी अन्य क्षेत्र में भी सफल नहीं होगा। हो सकता है कि जिस क्षेत्र में उसे असफलता हाथ लगी है, वह क्षेत्र उसके पसंद तथा रूचि का क्षेत्र नहीं हो।

अधिकतर मामलों में बच्चों के लिए उनके करियर का चुनाव बिना उनकी राय जाने उनके पेरेंट्स तय कर देते हैं तथा फिर उनसे उस क्षेत्र में सफल होने की उम्मीद लगा बैठते हैं। दरअसल पेरेंट्स अपने बच्चों में सुपरमैन जैसी छवि चाहते हैं तथा उसे हर क्षेत्र में परिपूर्ण देखना चाहते हैं।

असफलता हमारी सबसे बड़ी शिक्षक

वो अपने बच्चे को पढाई में टॉप पर रहने के साथ-साथ अच्छा तैराक, गायक, नर्तक, संगीतकार, खिलाड़ी, मार्शल आर्ट्स आदि में निपुण चाहते हैं। यह सब कार्य तो इकलौता सुपरमैन ही कर सकता है।

हमें यह बात समझनी चाहिए कि इंसानी क्षमताएँ सीमित होती हैं तथा असीमित क्षमताओं वाले को इंसान नहीं भगवान कहा जाता है तथा हर इंसान के घर भगवान अवतार नहीं लिया करते हैं।

बचपन में ही पेरेंट्स अपनी इच्छाएँ अपने बच्चों पर प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से यह कहकर थोपते हुए नजर आते हैं कि हमारा बच्चा तो ये बनेगा या वो बनेगा।

दरअसल पेरेंट्स अपनी असफलता को अपने बच्चों के माध्यम से सफल करना चाहते हैं तथा वे यह सोचते हैं कि जो कार्य हम नहीं कर पाए वह कार्य हमारे बच्चे करें।

बच्चों की अनिच्छा के बावजूद उन्हें उसी तरफ कदम बढ़ाना होता है जिस तरफ उनके पेरेंट्स चाहते हैं तथा नतीजा असफलता होती है।

कहते हैं कि असफलता सफलता की पहली सीढ़ी होती है परन्तु यह बात सिर्फ पढ़ने और लिखने तक ही सीमित होती है। बहुत सी जगह पर तो पहली बार असफल होने का मतलब भी नाकारा साबित हो जाना होता है।

किसी एक क्षेत्र में एक बार असफल होने का मतलब यह कतई नहीं होता है कि वह व्यक्ति कुछ भी करने के लायक नहीं है।

असफल होने पर लोगों में अपने बारे में नकारात्मक धारणा बन जाने से बहुत से बच्चे या तो तनाव में आ जाते हैं या फिर आत्महत्या कर बैठते हैं।

हमें यह समझना होगा कि सफलता तथा असफलता तो आती जाती है और ये जीवन का चरम लक्ष्य कदापि नहीं हो सकती हैं तथा कोई भी सफलता या असफलता इंसानी जीवन से अधिक महत्वपूर्ण नहीं है।

बुजुर्गों ने भी कहा है कि पहला सुख तो निरोगी काया होती है। एक क्षेत्र में असफल होने का यह मतलब जीवन त्यागना नहीं होता है।

जो क्षेत्र हमारे लिए सर्वोपरि है वह दूसरे के लिए हांशिये पर होता है जैसे वैज्ञानिक के लिए पढाई सर्वोपरि तथा खिलाड़ी के लिए खेल सर्वोपरि होता है। लक्ष्य बदलने पर प्राथमिकताएँ बदल जाती है।

दुनिया में ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जहा एक क्षेत्र में असफल व्यक्ति दूसरे क्षेत्र में सर्वाधिक सफल व्यक्ति रहे हैं। उदाहरण के तौर पर अलबर्ट आइन्स्टाइन भी पढ़ने में बहुत अच्छे नहीं थे परन्तु उन्होंने भौतिक शास्त्र की दुनिया को पूरी तरह से बदल दिया था।

असफलता हमारी सबसे बड़ी शिक्षक होती है तथा सफलता प्राप्त करने के जो गुर असफलता सिखा सकती है वो कोई और नहीं सिखा सकता है। अगर ध्यान से असफलता के कारणों का विश्लेषण करके उन पर अमल किया जाये तो हम निश्चित रूप से फलता प्राप्त करेंगे।

असफलता से लड़ने के लिए प्रकृति ही हमारा मार्ग प्रशस्त करती है तथा उसका सर्वप्रमुख तथा सबसे सामान्य उदहारण चींटी का होता है जो अपने से कई गुना वजन को खींचतीं है। बीसियों बार असफल होती है परन्तु अपने कार्य को बीच में नहीं छोडती है और अंततः सफल होती है।

अंततः कहने का मतलब यह है कि हमें किसी एक क्षेत्र में असफलता से घबराना नहीं चाहिए तथा यह समझना चाहिए कि मंजिले और भी हो सकती है तथा अपनी क्षमता के अनुरूप मंजिल का चुनाव कर चींटी की भाँति उसे प्राप्त करने के लिए जुट जाना चाहिए। जब मंजिल बदल जाती है तो उसे पाने के रास्ते भी बदल जाते हैं।

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Written by:
Ramesh Sharma

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